Ananya IyerVIEW PROFILE →
भारत में क्रिप्टो का दोहरा चेहरा: करोड़ों निवेशक, पर सख्त कर और सतर्क सरकार
भारत में क्रिप्टोकरेंसी को अपनाने वालों की संख्या करोड़ों में पहुंच गई है, लेकिन सरकार अब भी सतर्क है। भारी कर, आरबीआई का विरोध और डिजिटल रुपये पर जोर इस क्षेत्र की तस्वीर को जटिल बना रहे हैं।
भारत में क्रिप्टोकरेंसी की पूरी कहानी एक अजीब विरोधाभास से भरी हुई है। एक ओर जहां करोड़ों आम भारतीय इस डिजिटल संपत्ति में तेजी से निवेश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार और नियामक संस्थाएं इसे लेकर अब भी बेहद सतर्क और सावधान रुख अपनाए हुए हैं।
इस दोहरे रवैये ने एक ऐसी अनोखी स्थिति पैदा कर दी है, जहां क्रिप्टो न तो पूरी तरह प्रतिबंधित है और न ही पूरी तरह वैध। यह लगातार बनी हुई अनिश्चितता निवेशकों और कारोबारियों दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, जिसका कोई स्पष्ट समाधान फिलहाल नजर नहीं आता।
करोड़ों में पहुंचे उपयोगकर्ता

अपनाने के मामले में भारत आज दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो चुका है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, देश में सक्रिय क्रिप्टो उपयोगकर्ताओं की कुल संख्या दस करोड़ के आंकड़े को भी पार कर चुकी है, जो इस क्षेत्र की अपार लोकप्रियता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
हालांकि, वास्तविक रूप से सक्रिय निवेशकों की तस्वीर थोड़ी अलग है। मई 2026 तक के अनुमानों के मुताबिक, देश में लगभग चार करोड़ क्रिप्टो निवेशक हैं, जिनके पास कुल मिलाकर करीब 2.1 अरब डॉलर मूल्य की डिजिटल परिसंपत्तियां मौजूद बताई जाती हैं।
भारी कर का बोझ
इस पूरे क्षेत्र पर सरकार का सबसे बड़ा असर कराधान के रूप में साफ दिखाई देता है। वर्ष 2022 के वित्त अधिनियम के तहत, वर्चुअल डिजिटल एसेट से होने वाले किसी भी मुनाफे पर पूरे 30 प्रतिशत की भारी दर से कर लगाया जाता है, जो कई निवेशकों को हतोत्साहित करता है।
इतना ही नहीं, हर एक लेनदेन पर एक प्रतिशत का अतिरिक्त टीडीएस भी काटा जाता है। इस बेहद सख्त कर व्यवस्था के बावजूद, दिलचस्प बात यह है कि इससे मिलने वाला सरकारी राजस्व लगातार बढ़ता ही जा रहा है, जो बाजार की असल गहराई को दर्शाता है।
उपलब्ध आंकड़े इस वृद्धि की स्पष्ट पुष्टि करते हैं। वित्त वर्ष 2024 में वर्चुअल डिजिटल एसेट से प्राप्त कर राजस्व बढ़कर लगभग 437 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो कि पिछले वित्त वर्ष के करीब 269 करोड़ रुपये की तुलना में दोगुने से भी कहीं अधिक है।
नियमन की ओर बढ़ते कदम
कर के अलावा, सरकार ने इस क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के लिए भी कई अहम कदम उठाए हैं। मार्च 2026 तक, कुल 54 वर्चुअल डिजिटल एसेट सेवा प्रदाताओं ने वित्तीय खुफिया इकाई के पास अपना पंजीकरण करा लिया था, जिससे इस पर निगरानी रखना आसान हुआ है।
इसके साथ ही, नियमों का पालन न करने वालों पर भी पूरी सख्ती बरती गई है। प्रवर्तन एजेंसियों ने ऐसी कुल 53 गैर अनुपालक क्रिप्टो वेबसाइटों और ऐप को बंद कर दिया, जो कि देश के मनी लॉन्ड्रिंग रोधी नियमों का खुलकर उल्लंघन कर रही थीं।
फिर भी, एक व्यापक और पूरी तरह समर्पित कानून का अभाव आज भी बना हुआ है। मार्च 2026 में संसद में यह स्पष्ट किया गया कि क्रिप्टो को पूरी तरह से नियमित करने या उस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का फिलहाल कोई भी प्रस्ताव सरकार के विचाराधीन नहीं है।
आरबीआई का सतर्क रुख
इस पूरी बहस में भारतीय रिजर्व बैंक का रुख सबसे अधिक सतर्क और आलोचनात्मक बना हुआ है। जुलाई की शुरुआत में, केंद्रीय बैंक ने संसदीय समिति के समक्ष बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि निजी वर्चुअल डिजिटल एसेट को किसी भी सूरत में कानूनी मान्यता नहीं दी जानी चाहिए।
रिजर्व बैंक निजी क्रिप्टो के बजाय अपने स्वयं के डिजिटल रुपये को एक कहीं बेहतर विकल्प के रूप में लगातार आगे बढ़ा रहा है। बैंक का दृढ़ मानना है कि यह सरकारी डिजिटल मुद्रा आम निजी क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े जोखिमों के बिना ही डिजिटल भुगतान की पूरी सुविधा प्रदान कर सकती है।
डिजिटल रुपये का व्यावहारिक प्रयोग भी अब लगातार बढ़ता ही जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, इसके लेनदेन की कुल मात्रा पंद्रह करोड़ को पार कर चुकी है, जबकि इसका कुल मूल्य 34,000 करोड़ रुपये के आंकड़े से भी अधिक हो गया है, जो इसकी लगातार बढ़ती स्वीकार्यता का प्रमाण है।






