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एक और दीवार से टकराया भारत का क्रिप्टो कानून: संसदीय सुनवाई रद्द, पर वैश्विक एक्सचेंज लौट रहे हैं
जब दुनिया के बड़े क्रिप्टो एक्सचेंज कॉइनबेस और बायनेंस भारत में वापसी कर रहे हैं, तभी देश का क्रिप्टो कानून एक और देरी का शिकार हो गया। संसदीय पैनल ने 'आखिरी' मानी जा रही सुनवाई अचानक रद्द कर दी, जिससे नियामक अनिश्चितता और गहरा गई।
भारत की क्रिप्टोकरेंसी की कहानी इस समय एक अजीब मोड़ पर खड़ी है। एक ओर जहां दुनिया के दिग्गज एक्सचेंज देश में वापसी के लिए बेताब हैं, वहीं दूसरी ओर देश का बहुप्रतीक्षित क्रिप्टो कानून एक और अड़चन में फंस गया है, और यह विरोधाभास भारत की क्रिप्टो कहानी का सार बन गया है।
आखिरी मानी जा रही सुनवाई रद्द
हाल ही में एक संसदीय पैनल ने एक अहम सुनवाई को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा कर दी। पैनल ने 12 अगस्त 2026 को जारी एक नोटिस के जरिए 27 अगस्त के लिए सुनवाई तय की थी, लेकिन महज़ आठ दिन बाद ही इसे बिना कोई नई तारीख दिए अचानक रद्द कर दिया गया, जिससे सभी हैरान रह गए।
यह सुनवाई कोई साधारण बैठक नहीं थी, बल्कि इसे बेहद निर्णायक माना जा रहा था। आर्थिक मामलों के विभाग की यह सुनवाई उस संसदीय अध्ययन की आखिरी संस्थागत कड़ी को पूरा करने वाली थी, जिसके तहत पैनल पहले ही आरबीआई, आईसीएआई, एफआईयू और कई प्रमुख एक्सचेंजों का पक्ष सुन चुका था।

इसकी अहमियत इसी बात से समझी जा सकती है कि इसे मूल रूप से 15 जुलाई को 'सिफ़ारिशें अंतिम रूप देने से पहले सबूतों का आखिरी दौर' बताया गया था। ऐसे में इसका बार-बार टलना यह दर्शाता है कि नीति-निर्माता अभी भी किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने में हिचकिचा रहे हैं।
देरी की भारी कीमत
इस तरह की लगातार देरी सिर्फ एक प्रशासनिक अड़चन नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम हैं। जब तक स्पष्ट नियम नहीं बनते, तब तक निवेशक, कारोबारी और एक्सचेंज सभी एक अनिश्चितता के माहौल में काम करने को मजबूर रहते हैं, जो किसी भी उभरते उद्योग के लिए स्वस्थ नहीं होता।
यह नियामक शून्य नवाचार को हतोत्साहित करता है और साथ ही आम निवेशकों को जोखिम में डालता है, क्योंकि उनके पास कानूनी सुरक्षा का स्पष्ट ढांचा नहीं होता। भारत जैसे विशाल बाज़ार के लिए यह अनिश्चितता एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है।
दिग्गज एक्सचेंजों की वापसी
इस अनिश्चितता के बावजूद, वैश्विक क्रिप्टो जगत भारत को नज़रअंदाज़ करने को तैयार नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि कई बड़े एक्सचेंज देश में फिर से कदम रख रहे हैं। कॉइनबेस, बायनेंस, बायबिट और बिटगेट जैसे नाम एफआईयू-इंडिया के साथ पंजीकरण कराने और मनी लॉन्ड्रिंग विरोधी कानूनों का पालन करने के बाद वापस लौट आए हैं।
यह वापसी दर्शाती है कि भारत का बाज़ार इन कंपनियों के लिए कितना आकर्षक है। आंकड़ों की बात करें तो जनवरी 2026 तक कुल 49 क्रिप्टो एक्सचेंज एफआईयू-इंडिया के साथ पंजीकृत थे, जिनमें 45 घरेलू और 4 विदेशी एक्सचेंज शामिल हैं, जो बाज़ार की गहराई को दर्शाता है।
सख़्त होती निगरानी
हालांकि, वापसी और नियमन के इस दौर में कानून का शिकंजा भी लगातार कसता जा रहा है। जांच एजेंसियां अवैध गतिविधियों पर पैनी नज़र रखे हुए हैं, और हाल के महीनों में इसके कई उदाहरण देखने को मिले हैं जो इस क्षेत्र की गंभीरता को दर्शाते हैं।
उदाहरण के तौर पर, जून 2026 में प्रवर्तन निदेशालय ने 500 करोड़ रुपये के कोर्वियो कॉइन मामले में छापेमारी और गिरफ्तारियां कीं। इसके अलावा, बेंगलुरु की पांच क्रिप्टो-भुगतान फर्मों पर 2,500 करोड़ रुपये के अनधिकृत लेनदेन को लेकर भी बड़ी कार्रवाई की गई, जो निगरानी की सख़्ती दिखाती है।
आगे की राह
कुल मिलाकर, भारत की क्रिप्टो तस्वीर इस समय गहरे विरोधाभासों से भरी है। एक तरफ बाज़ार खुल रहा है और वैश्विक खिलाड़ी लौट रहे हैं, तो दूसरी तरफ इसे नियंत्रित करने वाला बुनियादी कानून अभी भी अधर में लटका हुआ है, जिससे पूरा माहौल असमंजस से भरा नज़र आता है।
अब सभी की निगाहें संसद और नीति-निर्माताओं पर टिकी हैं कि वे इस दुविधा को कब और कैसे सुलझाते हैं। जब तक एक स्पष्ट और संतुलित कानून सामने नहीं आता, तब तक करोड़ों भारतीय क्रिप्टो उपयोगकर्ता उस स्पष्टता का इंतज़ार करते रहेंगे, जिसका वादा उनसे लंबे समय से किया जा रहा है।






