Ananya IyerVIEW PROFILE →
रुपये का डिजिटल भविष्य: भारत की स्टेबलकॉइन दौड़ और डॉलर का बढ़ता खतरा
अमेरिका के GENIUS एक्ट के बाद डॉलर-समर्थित स्टेबलकॉइन की बाढ़ के बीच भारत रुपये-समर्थित स्टेबलकॉइन 'ARC' पर विचार कर रहा है, जबकि RBI मौद्रिक संप्रभुता को लेकर सतर्क है।
क्रिप्टो पर भारत की बहस अब तक कराधान और नियमन के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन अब इसका केंद्र बदल रहा है। दुनिया भर में स्टेबलकॉइन, यानी किसी स्थिर मुद्रा से जुड़े डिजिटल टोकन, तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं और यह भारत के लिए एक नई चुनौती और अवसर दोनों बनकर उभरे हैं।
इस पूरे परिदृश्य को एक बड़े वैश्विक घटनाक्रम ने और तेज कर दिया है। अमेरिका में डॉलर-समर्थित स्टेबलकॉइन को कानूनी मान्यता मिलने के बाद, भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पूंजी के बाहर जाने का दबाव बढ़ गया है, जिससे नीति निर्माताओं की चिंता स्वाभाविक रूप से बढ़ी है।
GENIUS एक्ट और वैश्विक होड़
अमेरिका में 18 जुलाई 2025 को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस GENIUS एक्ट पर हस्ताक्षर किए, वह डॉलर-समर्थित स्टेबलकॉइन को औपचारिक कानूनी दर्जा देता है। यह कानून सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों में भारी बहुमत से पारित हुआ, जो अमेरिका की क्रिप्टो-समर्थक नीति का स्पष्ट संकेत है।
इस कानून ने पूरी दुनिया में एक होड़ छेड़ दी है। विशेषज्ञों को डर है कि इससे कमजोर संस्थागत ढांचे वाली उभरती अर्थव्यवस्थाओं से भारी मात्रा में तरलता निकलकर डॉलर-समर्थित टोकनों की ओर जा सकती है, जो मुद्रा स्थिरता के लिए एक बड़ा जोखिम है।
आरबीआई ने स्वयं इस प्रवृत्ति को रेखांकित किया है। केंद्रीय बैंक के अनुसार, स्टेबलकॉइन की मांग अक्सर उन अर्थव्यवस्थाओं में अधिक मजबूत रही है जहां संस्थागत और राजनीतिक स्थिरता कमजोर है और अल्पकालिक डॉलर-आधारित परिसंपत्तियों तक पहुंच सीमित है।
भारत का 'ARC' स्टेबलकॉइन
इस चुनौती का सामना करने के लिए भारत अपना खुद का समाधान तलाश रहा है। कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, देश 2026 की पहली छमाही में एक रुपये-समर्थित स्टेबलकॉइन लॉन्च कर सकता है, जिस पर पॉलीगॉन और फिनटेक कंपनी एएनक्यू फाइनेंस मिलकर काम कर रही हैं।
इस प्रस्तावित टोकन को ARC यानी एसेट रिजर्व सर्टिफिकेट नाम दिया गया है। दावा किया जा रहा है कि यह टोकन सरकारी प्रतिभूतियों और ट्रेजरी बिलों से समर्थित होगा और इसका मूल्य भारतीय रुपये के साथ एक-से-एक के अनुपात में स्थिर रखा जाएगा।
इसका एक बड़ा व्यावहारिक फायदा प्रेषण यानी रेमिटेंस के क्षेत्र में हो सकता है। भारत का विशाल प्रवासी समुदाय हर साल भारी मात्रा में पैसा घर भेजता है, और स्टेबलकॉइन इस लागत को मौजूदा तीन से पांच प्रतिशत से घटाकर एक प्रतिशत से भी कम पर ला सकते हैं।
RBI की सतर्क नीति

हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक इस पूरे मामले पर बेहद सतर्क और प्रतिबंधात्मक रुख अपनाए हुए है। केंद्रीय बैंक चेतावनी देता है कि विदेशी मुद्राओं से समर्थित निजी स्टेबलकॉइन भारत की मौद्रिक संप्रभुता के लिए सीधा खतरा पैदा कर सकते हैं।
दूसरी ओर, आरबीआई का मानना है कि रुपये-समर्थित स्टेबलकॉइन भी सरकार के राजस्व और वित्तीय स्थिरता को कमजोर कर सकते हैं। संकट के समय इन टोकनों से नकदी की ओर तेजी से भागना ऐसी तरलता की समस्याएं पैदा कर सकता है जिन्हें संभालना केंद्रीय बैंक के लिए मुश्किल होगा।
अपने इसी रुख को दोहराते हुए, आरबीआई ने 2 जुलाई को संसदीय स्थायी समिति से स्पष्ट रूप से कहा कि आभासी डिजिटल परिसंपत्तियों यानी वीडीए को कानूनी मान्यता नहीं दी जानी चाहिए, और इसके विकल्प के रूप में डिजिटल रुपये को प्राथमिकता दी।
इस तरह भारत एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है, जहां एक ओर वैश्विक तकनीकी होड़ में पीछे न रहने का दबाव है और दूसरी ओर अपनी मौद्रिक संप्रभुता की रक्षा की चिंता। आने वाले महीनों में सरकार और आरबीआई के बीच इस नीतिगत रस्साकशी का परिणाम देश के डिजिटल वित्तीय भविष्य की दिशा तय करेगा।






