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अरबों डॉलर की बचत का सवाल: क्या स्टेबलकॉइन भारत के रेमिटेंस को बदल सकते हैं?
भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा विदेशी पैसा पाने वाला देश है, पर हर ट्रांसफर पर मोटी फीस कटती है। स्टेबलकॉइन सस्ता और तेज़ विकल्प देते हैं, लेकिन भारतीय नियम अभी इस राह में बड़ी बाधा हैं।
दुनिया की सबसे बड़ी रेमिटेंस मंज़िल
हर साल विदेशों में काम करने वाले करोड़ों भारतीय अपने परिवारों को अरबों डॉलर घर भेजते हैं, और यही पैसा देश की अर्थव्यवस्था का एक बेहद अहम सहारा बनता है। इस मामले में भारत पूरी दुनिया में पहले स्थान पर है, यानी विदेश से सबसे ज़्यादा धन पाने वाला देश बन चुका है।
उपलब्ध आंकड़े इस विशाल पैमाने को बहुत साफ़ तरीके से बयां करते हैं। अकेले अमेरिका से भारत आने वाला रेमिटेंस लगभग 129 अरब डॉलर सालाना तक पहुँचता है, जो विश्व बैंक के अनुसार दुनिया का सबसे बड़ा द्विपक्षीय धन प्रवाह है और लाखों परिवारों की ज़िंदगी को सीधे प्रभावित करता है।
पुरानी व्यवस्था की भारी कीमत
लेकिन इस पैसे को घर भेजने की पूरी प्रक्रिया आज भी बेहद महँगी और धीमी बनी हुई है। पारंपरिक बैंक ट्रांसफर, जैसे कि स्विफ्ट के ज़रिए भेजा गया पैसा, अक्सर अपनी मंज़िल तक पहुँचने में तीन से पाँच कारोबारी दिन तक का समय ले लेता है, जो आज के तेज़ दौर में बहुत लंबा माना जाता है।
समय से भी बड़ी समस्या इसकी असल लागत है। पारंपरिक तरीकों से भेजे गए पैसे में से अक्सर छह से सात प्रतिशत तक की राशि फीस और तरह-तरह के शुल्क के रूप में कट जाती है, यानी हर भेजे गए सौ डॉलर में से कई डॉलर बीच रास्ते में ही कहीं गायब हो जाते हैं।
यह छोटी सी दिखने वाली फीस असल में एक बहुत बड़ी रकम बन जाती है। जब कुल मिलाकर अरबों डॉलर का प्रवाह हो, तो कुछ प्रतिशत की कटौती भी सालाना अरबों डॉलर के बराबर हो जाती है, जो सीधे तौर पर आम मेहनतकश परिवारों की जेब से निकलने वाला पैसा है।
स्टेबलकॉइन का वादा

ठीक यहीं पर स्टेबलकॉइन एक बेहद आकर्षक विकल्प के रूप में सामने आते हैं। ये ऐसी क्रिप्टोकरेंसी हैं जिनका मूल्य आमतौर पर डॉलर जैसी किसी स्थिर मुद्रा से जुड़ा होता है, जिससे बिटकॉइन जैसे तीखे उतार-चढ़ाव का जोखिम काफ़ी हद तक कम हो जाता है।
इनकी सबसे बड़ी ताक़त इनकी गति और कम लागत में छिपी है। स्टेबलकॉइन के ज़रिए किया गया लेनदेन अक्सर तीन मिनट से भी कम समय में पूरा हो जाता है, वह भी दिन के चौबीसों घंटे और सप्ताह के सातों दिन, बिना किसी बैंकिंग अवकाश या छुट्टी की परवाह किए बिना।
फीस के मामले में भी दोनों के बीच का अंतर बेहद नाटकीय है। स्टेबलकॉइन रेल के ज़रिए भेजे गए पैसे पर शुल्क आमतौर पर एक प्रतिशत से भी कम होता है, जो पारंपरिक तरीकों की छह से सात प्रतिशत तक की भारी कटौती के मुक़ाबले वाकई बेहद कम कहा जाएगा।
भारत और नियमों की दीवार
यह देखते हुए इसमें कोई हैरानी नहीं कि भारत में इस तकनीक को लेकर उत्साह ज़बरदस्त है। भारत क्रिप्टो अपनाने के मामले में पूरी दुनिया में पहले स्थान पर है, और अनुमान है कि साल 2024 में भारतीय पतों से लगभग 89 अरब डॉलर का स्टेबलकॉइन लेनदेन हुआ था।
लेकिन इस उत्साह के रास्ते में एक बहुत बड़ी दीवार खड़ी है, और वह है सख़्त नियमन। भारत की उदारीकृत विप्रेषण योजना के तहत स्टेबलकॉइन और क्रिप्टो चैनल को विदेश पैसा भेजने का वैध माध्यम नहीं माना जाता, और हर ट्रांसफर को किसी अधिकृत बैंक से होकर ही गुज़रना पड़ता है।
भारतीय रिज़र्व बैंक का रुख भी इस पूरे मामले में बेहद सतर्क बना हुआ है। एक ओर वह निजी स्टेबलकॉइन पर तमाम पाबंदियाँ बनाए रखता है, तो दूसरी ओर अपने खुद के डिजिटल रुपये यानी सीबीडीसी को आगे बढ़ाने पर अपनी पूरी ताक़त लगा रहा है।
आगे की राह
यह पूरी स्थिति एक बेहद दिलचस्प विरोधाभास पैदा कर देती है। एक तरफ़ ऐसी शक्तिशाली तकनीक मौजूद है जो आम भारतीयों के अरबों डॉलर बचा सकती है, तो दूसरी तरफ़ मौजूदा सख़्त नियम उसे रेमिटेंस के लिए खुलकर इस्तेमाल करने की इजाज़त ही नहीं देते हैं।
वैश्विक स्तर पर देखें तो रेमिटेंस बाज़ार लगातार तेज़ी से बढ़ रहा है, और साल 2026 में इसके करीब 879 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान लगाया गया है। ऐसे विशाल बाज़ार में लागत घटाने वाली कोई भी तकनीक स्वाभाविक रूप से बहुत बड़ा असर डालने की क्षमता रखती है।
अंततः असली सवाल तकनीक की क्षमता का नहीं, बल्कि नियमन और भरोसे का है। अगर भारत सुरक्षा और पारदर्शिता को सुनिश्चित करते हुए कोई संतुलित रास्ता निकाल पाता है, तो स्टेबलकॉइन आने वाले वर्षों में करोड़ों परिवारों के लिए पैसे भेजने का पूरा तरीका ही बदल सकते हैं।






